सत साहिब !
सतगुरु देव की जय। बंदी छोड़ कबीर साहिब जी की जय। बंदी छोड़ गरीब दास जी महाराज जी की जय। स्वामी राम देवानंद जी गुरु महाराज जी की जय हो। महाराज
सर्व संतों की जय। सर्व भक्तों की जय। धर्मी पुरुषों की जय। श्री काशी धाम की जय। श्री छुड़ानी धाम की जय। श्री करोंथा धाम की जय। श्री बरवाला धाम की जय।
सत साहिब !
परम पिता परमात्मा कबीर जी की असीम रजा से बच्चो आज हम काल के षड़यंत्र को ठीक-ठीक समझ रहे हैं। यह शरीर अपना नहीं। यह संसार अपना नहीं। यह परिवार अपना नहीं। यह संपत्ति अपनी नहीं। अपना शरीर भी नहीं।
गरीब दास जी कहते हैं, गरीब काया तेरी है नहीं यह माया - संपत्ति कहां से हो चरण कमल में ध्यान रख इन दोनों को खो। इस शरीर को भी भूल, संपत्ति को भी छोड़। छोड़ना, कोई छोड़कर दूर नहीं जाना, इस बिना काम नहीं चले, यानी इस संपत्ति पर ही पूरा अट्रैक्शन मत रख। इस बॉडी कच्चे सांग के लीपा पोती नावा धोई इस पर 36 प्रकार के पडर पडर लाकर इस समना जाही है इस मिट्टी से लाभ उठा दे यह शरीर यदि भक्ति नहीं करते तो दो अन्य की भक्ति कर लेता इसकी कीमत नहीं यह बे कीमत आपको प्राप्त है मनुष्य शरीर (0:35)
अब बच्चों जैसा कि आप प्रसंग सुन रहे हो काल का भयंकर जाल है संत गरीब दास जी ने परमात्मा प्राप्ति के उपरांत उनसे प्राप्त ज्ञान को उनकी दव दृष्टि खुल गई थी दिव दृष्टि एक दूरबीन समझो सूक्ष्म दर्शी और दूरदर्शी तो यह इसकी रेंज हो है ऋषियों की भी जो दृष्टि खुल जाया करती थी वो इसको एक दूसरे को सिद्धि दे भी देते थे लेकिन उनकी कुछ फिक्स होती है टाइम उसका लिमिट होती है कहां तक देख सकते हैं संत गरीब दास जी को जो प्राप्त थी दीव दृष्टि उसकी कोई सीमा नहीं थी तो उन्होंने लाखों अरबों खरबों वर्ष पहले का युगों पहले की बात वर्तमान की और भविष्य की सारी बता रखी है उन्होंने सतलोक देखा वहां जाने के लिए तरफ गए और फिर हमारे लिए कितना अमर ज्ञान और कितना सच्चा सूचा ज्ञान प्रमाणित यह ज्ञान लिखवा दिया (1:55)
अब हम यहां क्यों फसे यह अपनी गलती है कबीर साहब हमारे पिता है माता चा पिता है और यह हमारे लिए भटक रहे हैं हम उसके अंश है वह हमसे दूर नहीं हो पा रहा हमने गलती करती लेकिन वह हमारे साथ फिर भी है कि इनको किसी तरह फिर से वापस व ले चलो अब हम यहां कति दुख पा लिए और आज मान ले सारी सुविधा है नंदे लोक में उत्तम समझा धन भी है संपत्ति यानी बच्चे भी है खूब बढ़िया टाइम पास हो र है और एक मिनट में बच्चे भी मर जाए आप भी मर जा फल जा एक्सीडेंट हो जा कुछ भी नाश हो सके इस गंदे लोक ने के अच्छा मानो कब तक है य अच्छा तो इसके लिए कबीर साहब ने और गरीबदास जीने सबसे ज्यादा दोषी इस प्रकृति देवी आदि माया और ज्योति निर काल को मान रख है कि इन ने य प्रपंच बनाया जिस कारण से यह भोली आत्मा इनके साथ चली आई तो हमारे को राहत दे दी है दाता ने कि तुम्हें वापस स्थान दिया जा सकेगा यह दोनों वहा नहीं जा सकते हैं इसलिए यह दोनों एक होकर अब परमात्मा के द्रोही हो चुके हैं इन्होंने आपको य इतने जबरदस्त तरीके से बांध रख है ब्रह्मा विष्णु महेश को भी समझ नहीं आ रही यह हो क्या रहा है हमारा पिता कौन है आज तक य भ्रमित है इसके विषय में आपको अमर ग्रंथ संत गरीब दास जी की अमर वाणी आदि माया की आरती सुनाता हूं इसने कैसे कमाल कर रख है (3:09)
ओम आद मूल में तारी जा का पिता संख धारी ओंकार ज्योति निरंजन और ये आदि माया इनका पिता संख भुज दारी सत्पुरुष है ओम आदि मूल में तारी जा का पिता संख बुध धारी कृतम किया पुरुष आरंभ नीचे निम शक्ति कुरंबा जाके उधर से देवा आए ब्रह्मा विष्णु महेश्वर जाए युग छती कल्पता जाही ना कमल की खबर न पाई ओम माया आदि कुमारी तीनों देव जन में त्रिपरी कोट करण ऐसा तिस अंगा ब्रह्मा पूछते है प्रसंगा हे माता तू आदि कुमारी कौन पुरुष किसकी तू नारी बोली माया वचन अनादम मात पुत्र का ज्ञान सवाद कहते जा के उदर से तुम देवा आए ब्रह्मा विष्णु महेश जाए ओम माया आदि कुमारी तीनों देव जन्म त्रिपुरारी कोटि क ऐसा किस अंगा ब्रह्मा पूछित है प्रसंगा (5:12)
ब्रह्मा अपने माता से प्रसन करता है वेदों में भी प्रमाण है और देवी पुराण में भी ही प्रमाण है और सूक्ष्म वेदन सब का पिता है सब वेदों का इसमें कति बिल्कुल सार भरा पड़ है यह समझ नहीं सके इस करके अभी तक इस ग्रत का ठीक से ज्ञान सामने नहीं आया था कोटि किरण ऐसा तिस अंगा माता के शरीर की करोड़ों किरण सूर्य नहीं यानी बहुत ज्यादा नूरी शरीर है उनका भी ब्रह्मा पुछत है प्रसंगा ब्रह्मा अपनी मां से कुछ जानकारी चाहता है हे माता तू आदि कुमारी कौन पुरुष किसकी तू नारी तुम्हारा पति कौन है तू किसकी पत्नी है बोली माया वचन अनादम मात पुत्र का ज्ञान सवाद माता और पुत्र का अब ज्ञान चर्चा होती है या आदि झूठ आदी सची और सबको उदाग बैठी ई है (6:57)
सुनो पुत्र एक गुप्त कहानी निज गायत्री बोले वाण ओम आदि युद यदम सुनो पुत्र नित प्रसाद ओम मूल मंत्र प्रकाशा देख ब्रह्मा अजब तमासा सेना संख गन ग नारा ब्रह्मा विष्णु अनंत अपारा उसने अपनी शक्ति से ऐसा जादू जंत्र करके दिखा दिया कि तुम्हारे जैसे ब्रह्मा विष्णु बहुत कड़ है कर पुत्र दी दी जा के परे बस मीठा कली कली ब्रह्मा त्र पुरारी शंख मूर्ति पलमा धारी जीना पंथ कं कुर्बाना ज ब्रह्मा को र दना अधर आवाज हुई तिस बारी ध्यान धरे बमा तपो तपो कर वाक सुनाया लोक रचो बल मेरी माया आकाशवाणी ई ब्रह्माने जब ध्यान लगाया के तप करो तप करो तप करने के बाद फिर कहता है लोक रचो बल मेरी माया अब जीवों की उत्पत्ति करो संसार की रचना कर नीचे कौन पुरुष तुम रा क्या नामम आसन अस्थल कहिए धाम ब्रह्मा पूछता है कि आप कौन परमात्मा हो आपका स्थान कहां पर है ग ग रूप हुई एक वाणी सकल चक्र खुले ब्रह्म ज्ञानी लील अलीलू निर्वाणी नादम बाणी बोले अगम अक्षर समुंदर जाओ ब्रह्मा मानो वचन सुनो नि धर्म य का आगम व जा पाओ सेसा रूप चरण लाओ माता केरो आज्ञाकारी सेव आदि पुरुष बनवारी जद बरमा गीर समुंदर फट गए ब्रम कर्म के बद्र चरण कमल की महिमा गाई शेष सस कथा सुनाई सकल रूप एक फर्द फरा का लख चौरा बोलता का आए ब्रह्मा जननी पासा ंगी ने कीन तमासा (8:00)
अब व उसने आकाशवाणी की गुप्त रूप से ब्रह्माने पूछा कौन है टाल मटोल कर दिया तो अपनी माध रजा व बताओगी आए ब्रह्मा जननी पासा ंगी तुन की तमाशा अब माया कहती है सुन पुत्र एक कथा हमारी ब्रह्मा विष्णु महेश भंडारी मैं नागिनी नारायण दासी अपने जाए अप ही खासी अब सुन लो बोल वचन इस माता देवी के जय माता द जय माता द जो करा करे वो सुन लो ध्यान मैं नागनी नारायण दासी इस काल को नारायण कय मैं तो इसकी पत्नी हूं इसके अधीन हूं अपने जाए अप खासी भक्षण करू गर्भ गति जूनी उल्टा तार सम पुनी मो भरो हुकम कर दीना आदि पुरुष को यो बती अब व क्या कहती है तुम तीनों मुझे पत्नी बनाओ और सृष्टि रचो बच्चे पैदा करो यह सुन त्रिपुरारी कीन अंधे सा तीनों देवता बोले हे माता यो जीवन सा जीवन का आग लगो माता नारी पुत्र की होई हे जन्नी य कहाई इस बाप ने कहां धे हम ऐसा क्यों जुलम कर लिया त्र बंगी है रूप हमारा यो बावन मेटो विस्तारा तने बोली मैंसी करू थी इतने में उसने अपनी सबद शक्ति से तीन मिनट की पैदा की थोड़ी दूरी पर दूर छुपा दी यहां तक लिखा है पुराणों में के समुंदर में छुपा दी फिर तीनों ने सागर मंथन किया एक पहले निकली दूसरी तीन लड़कियों बारी बारी आई जवान तो माता ने कह दिया था कि पहचान कर लि जो पहली है उसने अलग रखी हो दूसरी ना अलग तीसरे नंबर की ना अलग वो तीनों को लेकर आगे बता दिया या प्रथम निकली या सेकंड या था पहली का नाम सावतरी रखा ब्रह्मा जी से शादी कर दी दूसरी का नाम लक्ष्मी रखा विष्णु से ब दी और तीसरी का नाम गौरी रखा वह शंकर से ब कहते ब्रह्मा शिव है बरा सावत्री लक्ष्मी गोरा यतर भंगी रूप दिखाया ब्रह्मा विष्णु शिव ब्रह्माया व्याह कर्म किया त्रिपुरारी इन तीनों का ब्याह कर दिया साखा ले आद बदरी अब तीनों का शादी कर दी (10:20)
ओम शब्द मांड एक मांडी यो प्रपंच किया एक रांडी य गरीब दास जी की हरियाणवी भाषा है एक ओम शब्द दे रख नम पूरे वेदों में और कोई मंत्र नहीं ओम शब्द मांड एक मांडी यो प्रपंच किया एक रांडी ऐसी कल्प करो अव दूता मां के कसम क मा के पूता पांच तत का कीन पसारा मंड ब बंड सरचे कर तारा सकल जोनी जल थल सर जाही ब्रह्मा विष्णु महेश उपाई नाद बिंद का सकल पसारा यो बावन अक्षर विस्तारा परम अक्षर सो गोप रहाई निश्चल पुरुष कबीर गोसाई अंत कोटि समूलम चरण कमल में सब स्थलम ओम सोहम सार संदेशा मानो सतगुरु का उपदेश इस सारे इंद्र जाल को काटने के लिए इस माया जाल को काटने के लिए यह बता दिया कि यह मंत्र यह 21 ब्रह्मांड और सात ब्रह्मांड तक को साफ कर देगा तुम्हारी सब रस्ते लेकिन पूरे सतगुरु से लेकर यह काम करेगा यही मादर य परानी यही आदि य अंत निशानी यही मद प्रसिद्ध अजुनी जब तब संयम ध्यान की धुनी राज पाट गज ठाट फकीरी बिना बंदगी झूठी इस सच्ची भक्ति के बिना सारी बवाद है राज पाट साधू बना फ क्या राजा क्या प्रजा होई धनी भक्ति बिन जन्म के राजा और क्या प्रजा धनी की भक्ति बिना सत्पुरुष धनी कबीर धनी की भक्ति बिना सभी अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं सत कबीर सब औरन दूजा कर हंसाया की पूजा दास गरीब सार नाम एक निका योग यग जप तप का टीका इस सारे माया जाल को खत्म करने के लिए यह मार्ग बता दिया (13:14)
अब इस माया के जाल को और विस्तार से समझा अजब गजब तरीके से यह अथ माया का ग्रंथ वो आदि माया की आरती थी यह है माया का ग्रंथ जो इसका गजब का जाल वर्णन किया गरीब दस किस किस प्रकार से जीव का नाश करती है कैसे इनको मूर्ख बना रही है तब कर का तप सफल हो दे और साधना करते हैं उनको ठीक से नहीं मार्ग पाने देती कति हद कर रखी है इसके अंदर सारा विवरण है अ माया का ग्रंथ ब्रम जोगनी जाल मदुती सुर नर मुनि जन खाय बगती दोनों दीन चले दे धाई सट दर्शन की ठोर न बाई इन सबको गलत रास्ते लगा रखे गलत साधनाए शास्त्र साधना कति जकड़ रखे क्या बताते हैं संत गरीब दास जी पंडित पकड़ चौपट लीने काजी के सर बोजे दीने कुतब गोस सब गलत गुजारी मारे मुला बंग पुकारी ये सारे वावा भाई बकते हैं वावा भाई की साधना कर रहे हैं इस कारण से कहते इसने ही सारा कुछ पंगा पा रख दोन मिल पीर पैगंबर गल तरा चलाए गुर जो मार गुण ड काए जालम युगनी ऐसा कीना मोहम्मद का सब मजहब सीना नेम नमाज करे थे रोजा जिनके कहीं न पाए खोजा जो हिंदू नितनेम कर्म कांड करे हैं और मुसलमान नमाज रोज करते हैं कते इनका कितना खोद नहीं पाया सारे नर्क में गए मारे रक्त ब्रम आचारी धाम पूजा सिर रखरी इनको देवी धामों का पूजन मेंला रख जसे काल कहता है कि मैं आपके संत के आने से पहले आपके दूत के आने से पहले इनको ऐसे उल्टे रास्ते पर ला दूंगा देवल यानी मंदिर मूर्ति धाम तीर्थ बरत और सारी शास्त्र साधना दृढ़ कर दूंगा ये सारा चार दिस को इसने दुर्गा देवी को दे रखा है या प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में सारे काम याया करवा (15:23)
जिनके सिर जटा बहुत थी लंबी मारे नागा मुनिवर बंबी बड़े बड़े जटा रखे थे साधना गलत थी गुफाओ बैठक भक्ति करा करते नागा थे गिरी पुरी यह सारे जिन सिर जटा बहुत थी लंबी मारे नागा मुनिवर बंबी चुंट मुंत सब सहारे जो धुनी पांच लगावत हारे जो पांच धुनी लगाया करते चुत बड़े बड़े बा रखने वाले लटा जटा ब के दा दी गजब के बाबा अपने दिखाऊ और मुंडी कोरा कच कोल क उस तर रा कर भगवा पहर के और बढ के दिखा ऊपर ल लगा के मला पहर के साधू बने फिरे थे और जो धुनी पांच लगावत आरे यह पांच ध आरे ला बैठे थे आरे आरे अ हरियाणा वाले तो समझते हैं रोत आरा के यह आरे ला रे थे यानी एक बट बाल रहे थे गुसे लकड़ी गर के पांच जगह न्यारे न्यारे थोड़ी थोड़ी दूरी प और उनके बीच में बैठ के न दिखाओ तो गजब का तपस्वी है गीता में लिखा जो तप करते हैं वह राक्षस है वो मुझे भी दुखी करते हैं और कमलो में बैठे जितने भी ये शक्तियां है इनके भी दुश्मन तब कति निषेध और ये सारे तप करया करते जिन सिर जटा बहुत ती लंबी मारी नागा मुनिवर ब चुडि मंडित सभी सहारे जो धुनी पाच लगावत आरे उर्द मुखी मारे बहु मुनी बहु सागर फिर आए जनी मारे बनखंडी निरवानी सिर दरसी से राए पानी ज्ञानी गुण मुनि भ मोहे दो पाट विच मही जोहे मारे वृ ब्रह्म ज्ञानी बहुर पड़े है चारों खानी उदासी मारे निर्मोही पकड़ चौपट टी धोई धोती सी धो दन की बन मटी कर रखी है उन मुन रहते रखते काया न को बाबा बड़ा ध्यान लगाए बैठा बोलता नहीं उदासी नर मोही अखाड़े अखाड़ वाले कहते इनको इनकी धोती सी धी ब्र मेंट रखी किसी के पास सत भक्ति नहीं उन मन रहते रखते काया जिनको धक्के दीने माया त्र काली करते अनाना तेर नर कीने शक्र सवाना यह देखे किस तरह के बचारी नरे नरी साधनाए व अपने मनमुक की साधना है को दिन में तीन बनावे सुबह दोपहर शाम और फिर साधन करे साधन का रोला हि नाग कर ले बिना ना के करले छ बना के कर ले एक बना के कर ले बिना कर स्नान तो शरीर की स्वस्ता के लिए स्वस्थ के लिए जरूरी है करना चाहिए पर यह नहीं करे करे भक्ति गलत करोगे तो कोई यज नहीं रकाली करते अनाना ते नरने शक्र सवाना व कुत्ते सूर बना दि इसने (18:09)
जो नर अंग लगावत छरा ते आने त्रर गुण व्यवहारा एक ऐसे होते केवल सारे शरीर पर राख ला र चार और दिखाओ बड़े त्यागी बैरागी बड़े महात्मा बड़े फे उनकी ति करी इसने क्योंकि साधना शास्त्र विध गीता अध्याय 16 शलोक 23 में स्पष्ट किया है शास्त्र विधि को त्याग जो मन मान आचरण करते हैं उनको ना सुख हो ना कोई सिद्धि प्राप्त हो ना उनकी गति हो नकी हु कैसे ग बच्चों यह क्लियर करना भी आपके लिए बहुत जरूरी है य भक्ति का एक अंग है आपकी साधना बहुत सहयोग देगा आपको एहसास होगा कि सचमुच हम जिना भगत और गजब के महात्मा माना थे तो कति डले ढो डले नरक की टिकट ले रहे मारे चारों वेद ब कंता जोनर 18 प्राण कथन जिनके कानों मुद्रा भारी जोगनी कीने घरबारी जो चारों वेदों को पढ़ते थे मारे चारों वेद बकता तो चारों वेदों को बक करते कथा सुनाया करते मौखिक याद करे थे और 18 पुराणों की कथा करते थे इनकी सबकी ति कर दी (21:46)
अब वेद वो चीज है गरीब दास जी कहते हैं रय है श्याम अथ यह चारों वेद चित भंगी रे सूक्ष्म वेद बाचे साहिब का सोहन सा सत्संगी इनके पास सक्षम वेद तो था ही नहीं चारों वेद चत बंगी या उसी को फिर से दोरा है मारे चारों वेद बकं बक करते बोला करते प्रवचन करते थे चारों वेदों से जो 18 पुराण कथन जिनके कानों मुद्रा भारी ते जोगने कीने गरबारी कान में मोटे मोटे बाले से डाला मोटे मोटे साधू नाथ कन पाले सिंगी नाथ रखते फरते जगनी को कीने बडवा सुन मंडल में रखते ताली जिनको जोगनी लाई जाली नखी निराशा रहते योगी ते नरकी ने पकड़ संयोग जिन चौ आसन कीने ते नर पकड़ पाखड़ दीने जो च आसन क्या करते उनको गधे बनाए पड़े ला दिए दती दुरमति नकटी दारी मारे योगी ब्रम खिलारी जो बदर कसौटी रखते देहा जिनके सिर पर डारी खे जो ने तपस्वी दिखाई देते उनकी ऐसे दुर्गति कर रखी है जती सती सब गलत किए हैं रहते सहते सभी लिए हैं मारे सेख भेख बैरागी सुते भेख जोगनी जागी (23:21)
यह जती सती सभी गलत किए बच्चों सुखदेव जती था राबिया जती थी दो जीवनत बिल्कुल ज से रही और तीसरी में नाश कर दिया कहां तक बचोगे इससे मारे मुनिवर गढ दे फासी जो गीता पढ़ आए काशी काशी में विद्यापीठ में पढ़ के आए थे वेद और गीता उनके फसी ला दी यानी कुत्ते बला दिए वेद पढ़े पर भेद ना जान ये बाच पुराण 18 और पत्थर की पूजा करें यह भूल रहे सर्जन मारे मुनिवर गल दे फासी जो गीता पढ़ आए कासी अंधे बहरे राह चला गलत किए जो बरन आए इंद्री जीतती कर डारे जिनके मंडे कीने कारे चुत मंडित गुफा धारी जिनको जोगरी लागी प्यारी नागा नगन रहे बन माही सो दोजक की राह चलाई बन बस्ती के सब ही मारे धर्म राय की नगरी डार (25:09)
ध्यान से सुनो जब यह परमात्मा कबीर जी जा रहे थे सतलो को इसको पता चल गया कि यह भगत है कोई निकल गया थार हाथ वहां आकर खड़ी हो गई एकांत ब के कवाद करी समय आने पर फिर से बताएंगे फिर उसका बाप है या तो गिरगी सतर कति गिरी ई आत्मा होगी तो कहते इसने कोई नहीं छोड़ र सबकी बट रखी नागा नगन रहे बन माही सो दोज नरक की रा सलाई नागा जो नगन रहते नंगे प में बिचारे भगवान के लिए भटक रहे सारे लेकिन रास्ता कति नहीं दे इसने पहले कह रखा सबकी दुर्गति रखूंगा किसी को भी रा नहीं दूंगा हाय इन सब प्रोसेस से आप निकल कर आए हुए हो आपने भी बहुत तपस्या की ऐसी ऐसी और आपको मालिक मिले तो किसी ना किसी जन्म में आपने उनसे या सच्ची भक्ति लेकर या भी साधना कर रखी कुछ दि धीरे धीरे की सत कमाई कराते कराते आज आपको यहां लाकर छोड़ दिया अब सुन बन के इतिहास कैसे कैसे दुखी है य सारे नागा नगन रहे बन माही सो दोजक की राह चलाई बन बस्ती के सब ही मारे धर्म राय की नगरी डारी सारे य धर्मराज के दरबार में फक दिया ठक करो हिसाब इनका ट हि साब भक्ति पाई कोई ना नरक में जाएंगे शस्त्र मनमानी आच मनमाने ो तप किया राज दे दिया फिर कुत्ते बना दिए गए रसातल ना पाए यम के जाली जीव बंधाए पंथी पंथ न पचे को दुर्लभ देश दूर र मारे भेख विवेक भुलाने सब जोगनी सेवक ठने च लोक पड़े यम जाला दुरमति योग रूप विशाला तीन लोक दिन चुन चुन खाए च तबक स काए ब्रह्म 2 सोर सराबा मुगदर मार गुर बरा कोम छती सरीत सब दुनिया जोगनी छत्रपति बड़े हनिया नाथ जीव की कौन चलावे योद्धा भूप लिए बड़ दवे (26:16)
अब सुनना न्यारे नरे दाने से गिन रखे गरीबदास होते दुर्योधन से जिस घर रते अनगिन बाजा होते वीर इतर बाई 11 अनी की टकराई 64 योगिनी बावन बीरा जिनके खपर भरे ने थीरा पंडो डोबे पकड़ हिमालय 18 सोनी खाई काल महाभारत करवाई श्री कृष्ण में बढ के काल में और कति इतने नाश नहीं हो लिया कृष्ण के शरीर में रहा और फिर यो क था तुम कोई पाप नहीं लगे के और युद्ध कर लो कहते 18 सनी तो खा गया काल 11 सोनी दुर्योधन की कौरवों की और सात अनी पांडवों की और पांडु डोबे पकड़े माले वही मालूम गला को मारी ो डोबे पकड़ हिमाल 18 अनी खाई काल चकवे छत्रपति बहु साज जिनके उद अस्त विच राजा ब्रम जोगनी सब ड काए जिनके गाव ठव नहीं पाए ना कुछ थे राम सरीखा जिन अपना नाम चलाया टीका वैसे यम जोराने लूटे उधर विनाश की घट फूटे न पू राम बन गया था अपने आप बन माटी करके मारा पहले या कबत भर दी फिर व दुर्गति कर दी (28:41)
मथुरा परी राज थे कंसा जिनके कहीं न पाए वनसा एक ब द फरा कर देती है और फिर ऐसी रुकती करके मरवा है सहसरा बाहु गाज डोबे फरस मार रकत तन जो ये परशुराम जी ने सहसरा बाऊ को मारा परसों से काट के गिर दिया जो इतना ताकतवर था जरा संग बहु जोर जमाया पकड़ टांग तन चीर भगाया बालि काल को दिया झपटा नोरा से मारे फेटा जरा सिंह बकवास करे था टांग पाट के मार दिया एक तरफ इनमें सिद्धियां सब होती थी सब भक्ति करते थे लेकिन यह करते इसलिए थी कि तो लड़ाई होता काम आवे इ मोक्ष माक्स का पता ही नहीं था जरा संग जो थे उसमें इतनी ताकत थी बी तो पाट दे तो उ ठीक मिल जा करता भीम ने दो बार पाड़ के फ उ फिर आगे मिल गया ज श्री कृष्ण में कालने संकेत किया कि इसकी टांग आधे इसने इधर फक आधे इधर तन कर था व पाड़ के दिखाई देखिए य पाटी एक इधर फ इर ज उसने आधा इर दूसरा उधर यानी वो फिर आए उठ जुड़े नहीं क्योंकि वो दूसरी साइड से आ तब य मर (30:32)
रावण छत्रपति थे राजा सुर नर मुनि जन जिस घर साजा योद्धा जुल में ब विद आकी कोट 33 बंद थे जाकी 33 कोट देवता रावण ने बंद कर रखे थे जिनकी हम हिंदू पूजा करते हैं कुंभ करण से होते बरा सवा लाख नाती संगरा एक लख दूत संग भारी सात समुंद्र लंका धारी अट पट किए लंक जद लूटी द खप्पर रावण के फूटी देखो कितनी गजब की वाणी कही है के रावण ने भक्ति करी डट के शिव जीी भगवान की और इतना जबरदस्त कुर्बान आदमी था ब्राह्मण था ये तो भक्ति करने वाले को रास्ता ठीक नहीं देते य आपने परमात्मा की और काल की तकरार सुनी होगी उसमें सिर्फ ज स्प कर दिया था कि इसे कर दूंगा इने कोई भी भक्ति नहीं करेगा सारे उल्टे रास्ते लाऊंगा ये सारे उल्टे रास्ते ला दिए खूब तपस्या करी और सिद्धियां आ गई खूब आकाश में उड़ जाने की जिसके बल पर 33 करोड़ देवताओं को अपनी कैद में घेर लिया इंद्र लूट लिया ऐसी ब्रान माटी करी और अंत में कैसे मरा कहते अट पट करी लंग दद लूटी 10 कप्पर रावण के फूटी अट पट करके मारा रावण रामचंद्र को बनवास कराया वहां से इसके मन में को बदाई सीता ठा के लेया और फिर इसका बकल करवा दिया कहते अट पट कर लंक जद लूटी द खपर जब रावण के पटी (31:58)
कृष्ण गुरु दुर्वासा लूटी मनसा भर कुछ पर छूटे श्री कृष्ण जी के गुरु थे दुर्वासा यहां तक कति ब्रह्मचारी रहा ऊपर चला गया स्वर्ग में वहां देवताओं की सभा थी इंदर बैठा था राजा सिंहासन में बैठा था औरत नाच रही थी और दुर्वासा भी उन्हीं सीट पर बैठा था जैसे फिल्म देखा कर देख रहे थे और यह भक्ति करके जा बकवास के लिए जाते देखा ठाट कर ये ठाट है इनके स्वर्ग के अंदर वह बकवास है जो धरती पर नहीं बस यह समझ लो तो यहां तो कति दती सती बना रहा व मन में दोष फिर आ गया उस बहन के दूध दीप को जा काटा बकवास के भाव से भरा बन के और कोई देख नागा उसने मार हाथ पट दे धरती पर पड़ कोई चीज कटेगी आदमी हाथ तो मारेगा तो उस राम जादा खड़ा हो गया रवा सा बने सारे हसन ला बैठे थे 8 और 33 करोड़ देवता लेले टिंडे अब फिर उसको श्रप दे दिया लड़की को तो संसार में गदी बनेगी तलोक अरे दुष्ट आत्मा यह है ताकतवर की उसने कोई उसकी बकवास में बाधा कर दे उससे लट मारे यह इसे देवता इस ऋषि थे बच्चों सुन लो इनकी सारी राम कहाणी यह कथा सुनाने का उद्देश्य दास का यही है कि आपको समझ आवे इनका पता चल जाए किसे ऋषि थे हम भी कति पागल हो रहे थेन ऊपर ये कैसे हो सकता इ भगवान ना पाया हुआ इ भगवान का कि हवा भी ना लागर आसपास की (33:44)
कृष्ण गुरु दुरवा सा लूटी मनसा भवर कुच पर छूटे रंगी ऋषी को सार चबाए नारद पूत बह जाए काम देव दग देव उगाता पारा ष पुत्री संगरा अब यह लंबी लंबी कहानी आपको सुना रखा है कि शिंगी ऋषि भक्ति करने के लिए अपने इंद्रियों पर काबू करने के लिए जंगल में गया बनवा 12 वर्ष तपस्या करी खाया पिया कम कति फखर में इतना आहार कम हो गया एक बार पेड़ के छाल का जीभ लावे उसी से संतुष्टि हो जा इनका नाभी में अमृत प्रारंभ हो जाता है एक क्रिया होती है अमृत क्रिया उसकी यह तो होगी पर मोक्ष नाम तो होगा वो ना होगा तो क्रिया सेरो अयोधा नगरी के पास आकर बैठ गया बण में जब इसको यह हो गया मैं कति इंद्रियों पर काबू पा चुका हूं संगी अयोध्या नगरी की बनी में आकर बैठ गया और य प्रदर्शन करे लोग देखे तो कुर्बान हो जा ओ हो रो ना सोता भी जागता रहता है ना कि मैं खाता और भाई 10 दिन हो गए न बैठा शिंगी ऋसी जी हदा नगरी के पास बनी में छोटा जंगल होता था गांव से थोड़ा सा दूर नगर से आधा किलोमीटर दूरी के चारों ओर होता था उसमें बैठ गया और एक पेड़ की तरफ मुख करके बैठ गया वहा तपस्या करे और दिन में एक बार पेड़ की तने के जीभ मारे उसी से संतुष्टि मान होगी इतना साधना कर ली इसने इस बात की चर्चा पूरी अधा नगरी में होगी लोग देखने जा सारी सारी रात बैठ के देखा सुब है कि मैं खावे है तो नहीं तो सबने गवाही दी कति नहीं खाता 10 15 20 दिन हो गए बैठे लोग देखने जा (35:34)
राजा दशरथ के केवल एक बेटी थी वह लड़की भी अपनी मां के साथ सहेलियों के साथ वहां गई तो उसने एक बैद से पूछा कि यह कैसे आंख खोले सुंदर ऋषि था जवान होते थे यह जवानी में भक्ति होया करे तो वह शांता नाम था दशरथ की पुत्री जब तक य रामचंद्र का जन्म नहीं हुआ था तो वैद ने बताया कि जहां यह जीव चट है ना व शहद लगा दो अनी कुछ दिन में पा खोल लेगा तो उस लड़की ने व शहद लगवा दिया औरन एक बार जी मारा करता उसने दो बीमारी स्वाद ल गया अगले दिन फिर लाई उस दिन चार पांच ब चट और ला दिया अगले दिन और ज्यादा लगा दिया पांच में दिन त आख खोल ली छक्का रोटी खाने लग गया राजा दशरथ य पुत्र ने संतान माने थे पहले लड़की का कोई लेखा नहीं होता था या बीमारी थी तो उसका संतान पुत्र नहीं था पुत्र प्राप्ति के लिए अर्जी लाई कि बड़ा तपस्वी साधु आया है राजा ने कहा जी ऐसे ऐसे मे पुत्र नहीं है और वरदान दो तो उसने कहा यज करनी पड़ेगी एक पुत्रो यज राजा उनको घर ले आया ह चलो आप मेरे घर चलो और उस पर शांता की सेवा लगा दी बेटी तु ऋषि की सेवा कर उधर से यज का समय धर दिया छ महीने बाद उधर से सांता का और उसका आपस में प्रेम हो गया और तो जब पता चला राजा दशरथ को बड़ा दुख हुआ भया से शादी नहीं हो सकती क्योंकि यह ब्राह्मण हम क्षत्रीय तो बात अड़ गी और उसने नाट कैसे ऋषि ब दिख पता नहीं के शराब दे देगा यह तो विष सांप भी तो थे डंक मार दे तुरत इस दर से राजा ने पूछा क्या करूं कैसे कर एक ऋषि ने शांता गोद ले ली अकी बया ऋषि की बेटी होगी ब्राह्मण की ब व पुत्र यत गई बाड़ में व संतान लेकर चला गया व बाद में वशिष्ठ मुनि औरन कर पुत्रे यग (37:49)
परमात्मा कहते हैं सबद सपस रूपस गंध यह पांच विकार है जीव केर जैसे सपस मतंग हाथी में काम वासना सबसे ज्यादा सबद सपस शब्द यानी जो कान का विषय है यह सबसे ज्यादा हिरण में है एक विशेष धुन निकालता शिकारी मृग पकड़ने वाला हिरण पकड़ने उस धुन के ऊपर इतना कुर्बान हो जाता है व इतना आकर्षित हो जाए उसके बस की बात नहीं मृग का हिरण का वो अपने आप से के जो यंत्र बजा र होता है ना उ जाकर नाड़ी टेक दे इतना वस है इतना फसा हुआ है यह जीव कान का विषय यानी जैसे गाने गुने सुनते हैं य कितने अच्छे लगते ऐसे यह शब्द फिर सपर्स आथ इसमें काम वासना सबसे ज्यादा शब्द सपर्स रूप ये पतंग होते है ना पतंग ये जैसे दीपक जलेगा उसके ऊपर कितने आ गिर मर जल उ नहीं रस जैसे मछली होती है मछली को पकड़ने के लिए एक टुकड़ा मांस का एक कुंडे में डाल देते कटे में लोहे के जल में डाल दे व खान खाति एकदम बेसरी हो मुह में दाब ले काटा फस जा उसके उस मांस का रस लेने के लिए व मरगी और फिर गं भरा जो होता है भावरा यह फूल के ऊपर बैठ जाता है इतना कुर्बान हो जाता है वो बंद हो जा फूल मब भी जहां कई बार ये वो सुकंद उठता नहीं उससे (40:07)
गरीब दास जी ने कहा है कि कुरंग मतंग सरंग और बरंगा इंद्री एक ठग ति संगा शबद सपस कुरंग मतंग पतंग सरंग और बरंगा यह पांच बने इंद्री एक ठ गती संगा इनका तो एक एक था यह विषय जिनके य वश होकर कभी कुर्बान हो गए मरज उल्टे नहीं हटे और तुमरे संग पांचों प्रकासा योग युगत की झूठी आसा के हे मानव ते दे इसने पांचों ला रखे कान का विषय तेरे में गाने सुन बड़ा जी कर और भगवान की कथा सुन भी लगे वासना कबीर साहब कहते हैं कबीर कुत्ता रुत प 30 दिन रहे उजास वासना वस प्रेरित रहता केवल 30 दिन और कामी नर कुता स छत बारा मास बच्चों इतना समझ लियो बस कहते तुमरे संख पात्रों प्रकाशा यह बकवास इंद्री साधू करूंगा इनसे कुछ नहीं होने का (42:09)
अब जैसे परमात्मा ने रास्ता बताया डेरे डंड खुश रहो खुश रे ना मोक्ष तुमको धर प्रलाद उधर ग तो फिर डेरे में के दोष तो यह तरीका बच्चों यह भ्रम आपका था कि बाहर जाकर भगवान मिलता हुआ जंगलों में तपस्या करने वालों को उने कीता दुर्गति करी च कर देते परमात्मा मिलेगा ऐसे आप लगे हो जैसे पूरा सतगुरु मूल ज्ञान कंप्लीट समाधान भक्ति और हो जाओ कुर्बान मालिक आपको मोक्ष दे सदा सुखी रखे सत सा हम (43:19)
